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मेरे गाँव में बसता है मेरा बचपन , गाँव का ये व्यस्त बाना लोगों की ताका झांकी , पर है बचा यहीं सुकून भी है, याद है मुझे मेरा गांव जहॉं हर चीज में मेरे बचपन का, वो बेशकीमती खजाना आज भी बसता है, झांक आई हूँ फिर हर वो जगह, जहाँ नन्हे से नादान दिल ने सपनों की पहली उड़ान भरी थी, मिट्टी से लथपथ वो पल इन साफ़ सुथरों से कितने अच्छे थे, आंखों में झलक हर बार उन लोगों की, खेतों की, पेड़ों की,
बेहद अपनापन जगाते है, महसूस होता है आज भी उस एकांत में, मेरे उस छोटे से गाँव में अपनों के बिच कितनी महफ़ूज़ हूँ, जज्बात है कुछ तो बात है, दिल को छू जाने वाले न जाने अनगिनत से कितने हर शाख पर पड़े अहसास है, शैतानियाँ पेड़ के झूलों में पड़ी है वहीं, नालों के कीचड़ में छपाक से पत्थर को फेंकना, बरसात में घर वालों से छुपकर वो अठखेलियां करना, दोस्त वो नादान से जिनमें प्यार सिवा कोई समझ ही नहीं,
कभी खेल खेल में रिश्तों की दुनिया का अजीब ताना बाना सजाना, तो कभी खुले गगन के तले एक छोर से दूसरे छोर को भाग कर पकड़ने की वो, बेमतलब से कोशिश कैसे सहेजू में इन पन्नो में वो मेरी जिंदगी का वो, अनमोल हिस्स्सा अनगिनत नादानियों से भरा पड़ा है जहां, हर एक किस्सा हर डाल पर फुदक फुदक कर, चिड़ियों सा जश्न बिन वजह ही मनाते रहे, आज न जाने क्यों उस आजादी उस जश्न के लिए निश्छलता से मनाने के लिए हम बस तरसते ही रहे।
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बेहद अपनापन जगाते है, महसूस होता है आज भी उस एकांत में, मेरे उस छोटे से गाँव में अपनों के बिच कितनी महफ़ूज़ हूँ, जज्बात है कुछ तो बात है, दिल को छू जाने वाले न जाने अनगिनत से कितने हर शाख पर पड़े अहसास है, शैतानियाँ पेड़ के झूलों में पड़ी है वहीं, नालों के कीचड़ में छपाक से पत्थर को फेंकना, बरसात में घर वालों से छुपकर वो अठखेलियां करना, दोस्त वो नादान से जिनमें प्यार सिवा कोई समझ ही नहीं,
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कभी खेल खेल में रिश्तों की दुनिया का अजीब ताना बाना सजाना, तो कभी खुले गगन के तले एक छोर से दूसरे छोर को भाग कर पकड़ने की वो, बेमतलब से कोशिश कैसे सहेजू में इन पन्नो में वो मेरी जिंदगी का वो, अनमोल हिस्स्सा अनगिनत नादानियों से भरा पड़ा है जहां, हर एक किस्सा हर डाल पर फुदक फुदक कर, चिड़ियों सा जश्न बिन वजह ही मनाते रहे, आज न जाने क्यों उस आजादी उस जश्न के लिए निश्छलता से मनाने के लिए हम बस तरसते ही रहे।


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