जब मन थोड़ा चकराता है, जब मन थोड़ा झुंझलाता है,
मैं तो लिख देता हूँ, जो भी मन में आता है मैं बस लिख देता हूँ।
लोग रोते होंगे किसी के बिन उसके ख्यालों में,
मैं तो ख्यालों के मोती पिरोकर माला पहन लेता हूँ ,
भीगता हूँ जब भी गमो की बारिश में
रूप शब्द का देकर मैं तो लिख देता हूँ।
. . . . . . . . . मैं तो लिख देता हूँ।
हुआ था रंगीन कुछ मुद्दतों बाद ,
पूरे न हो सके कुछ अनसुलझे ख्वाब,
ख्यालों के जाल से बचने के लिए कभी कभी रो देता हूँ।
बाकी यादों की बहार को और उस एकतरफा प्यार को
मैं तो लिख देता हूँ।
जो भी मन में आता है मैं तो लिख देता हूँ।
चलते चलते जो रुक जाए वो चाल काबिल नहीं होती,
पथ पर चाल जैसी भी हो कलम
को चाहकर दौड़ा देता हूँ,
अटकलें मंजिलों का सबूत है परवाह नहीं,
समाधान मिसरों में बदलकर मैं तो लिख देता हूँ।
जो भी मन में आता है मैं तो लिख देता हूँ।
कौन है जो हारा न हो,
दुनिया में ग़मों का मारा न हो,
हार से जीत का लेकर सबब कमर कस देता हूँ ,
जीत से चुकती हार को या बढ़ती ग़मों की मार को
मैं बस लिख देता हूँ , जो भी मन। . . . . .
सब लिख लिया जो दिल में दफन था,
अब जल गया जो भ्रम का कफ़न था ,
इसके सभी विकारों को और भ्रमीत विचारों को,
झट से भगा देता हूँ।
जब मन थोड़ा चकराता है, जब मन थोड़ा झुंझलाता है,
बस इतना सा लिख देता हूँ।
दिखाई न मंजिल अगर , क्या सपने छोड़े जाते है ,
भटके हुए मुसाफिर क्या आधे से लौट आते है ,
जुगनुओं का काम है चमकना ,
अँधेरे में भी अपना काम किये देता हूँ ,
कलम, लफ्ज, अल्फाज को "Raj " बाकी बचे हिसाब को मैं तो लिख देता हूँ।
जो भी मन में आता है मैं तो लिख देता हूँ.
मैं तो लिख देता हूँ, जो भी मन में आता है मैं बस लिख देता हूँ।
लोग रोते होंगे किसी के बिन उसके ख्यालों में,
मैं तो ख्यालों के मोती पिरोकर माला पहन लेता हूँ ,
भीगता हूँ जब भी गमो की बारिश में
रूप शब्द का देकर मैं तो लिख देता हूँ।
. . . . . . . . . मैं तो लिख देता हूँ।
हुआ था रंगीन कुछ मुद्दतों बाद ,
पूरे न हो सके कुछ अनसुलझे ख्वाब,
ख्यालों के जाल से बचने के लिए कभी कभी रो देता हूँ।
बाकी यादों की बहार को और उस एकतरफा प्यार को
मैं तो लिख देता हूँ।
जो भी मन में आता है मैं तो लिख देता हूँ।
Motivational
पथ पर चाल जैसी भी हो कलम
को चाहकर दौड़ा देता हूँ,
अटकलें मंजिलों का सबूत है परवाह नहीं,
समाधान मिसरों में बदलकर मैं तो लिख देता हूँ।
जो भी मन में आता है मैं तो लिख देता हूँ।
कौन है जो हारा न हो,
दुनिया में ग़मों का मारा न हो,
हार से जीत का लेकर सबब कमर कस देता हूँ ,
जीत से चुकती हार को या बढ़ती ग़मों की मार को
मैं बस लिख देता हूँ , जो भी मन। . . . . .
सब लिख लिया जो दिल में दफन था,
अब जल गया जो भ्रम का कफ़न था ,
इसके सभी विकारों को और भ्रमीत विचारों को,
झट से भगा देता हूँ।
जब मन थोड़ा चकराता है, जब मन थोड़ा झुंझलाता है,
बस इतना सा लिख देता हूँ।
दिखाई न मंजिल अगर , क्या सपने छोड़े जाते है ,
भटके हुए मुसाफिर क्या आधे से लौट आते है ,
जुगनुओं का काम है चमकना ,
अँधेरे में भी अपना काम किये देता हूँ ,
कलम, लफ्ज, अल्फाज को "Raj " बाकी बचे हिसाब को मैं तो लिख देता हूँ।
जो भी मन में आता है मैं तो लिख देता हूँ.
Written by Hom Krishan"Raj"
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