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Tuesday, August 13, 2019

कुछ दिनों से चारों तरफ तिरंगे की ही रौनक है- Poetry By Homkrishan "Raj"

12:22 PM 1
Happy Independence day to all of you and also Happy Raksha Bandhan

कुछ दिनों से चारों तरफ तिरंगे की ही रौनक है,
ऐसा लग रहा है जैसे 15 अगस्त आने वाला है,
ऐसा लग रहा है जैसे स्वतंत्रता दिवस आने वाला है।

सन 47 के 15 अगस्त को जब हमें आजादी मिली थी,
बहुतों को तो कीमत इसकी जान से देनी पड़ी थी,
कुछ पल याद कर लो उन्हें उनकी शहीदी का दिन आने वाला है।
कुछ दिनों से चारों तरफ तिरंगे की ही रौनक है,
ऐसा लग रहा है जैसे 15 अगस्त आने वाला है।

आजादी चाहे किसी की भी हो आसानी से कहां आती है,
ना जाने कितने सुरमाओं की जान तक चली जाती है,
उन सभी के पद चिन्हों को चूमने का दिन आने वाला है।
कुछ दिनों से चारों तरफ तिरंगे की ही रौनक है,
ऐसा लग रहा है जैसे 15 अगस्त आने वाला है।

धीरे-धीरे एक-एक कर साल बीतते जा रहे,
भूलकर शिक्षा उन आदर्शों की हम किस ओर जा रहे,
इसी राह पर चलते चलते एक दिन अंधेरा छाने वाला है।
कुछ दिनों से चारों तरफ तिरंगे की ही रौनक है,
ऐसा लग रहा है जैसे 15 अगस्त आने वाला है।

71 साल से आजाद है हम पहचान जैसे विलुप्त हुई,
बाकी देशों की तरक्की आसमा को छूने लगी,
हारे नहीं है हम भारतवासी एक दिन आसमान छूने वाला है।
कुछ दिनों से चारों तरफ तिरंगे की ही रौनक है,
ऐसा लग रहा है जैसे 15 अगस्त आने वाला है।


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हम नाम के आजाद हो गए सोच अभी भी गुलाम है,
आज हम को लूटते अपने ही बड़े-बड़े नाम है,
इन लुटेरों को बाहर भगाओ ये संदेश फैलने वाला है।
कुछ दिनों से चारों तरफ तिरंगे की ही रौनक है,
ऐसा लग रहा है जैसे 15 अगस्त आने वाला है।

कुछ शासन ने हमको लूटा कुछ प्रशासन ने दबाया है,
कुछ देशभक्त जांबाजों ने इन्हें पल-पल सबक सिखाया है,
अब 1/125 करोड़ इन्हे सबक सीखाने वाला है।
कुछ दिनों से चारों तरफ तिरंगे की ही रौनक है,
ऐसा लग रहा है जैसे 15 अगस्त आने वाला है।

देश के युवा हर तरफ बेरोजगारी देख रहे,
रोजगार ना मिल रहा तो नशे की मार झेल रहे,
नौकरी में रिश्वतखोरी, बेईमानी और राजनीति का ही बोलबाला है।
कुछ दिनों से चारों तरफ तिरंगे की ही रौनक है,
ऐसा लग रहा है जैसे 15 अगस्त आने वाला है।

नारी कि यहां इज्जत नहीं रोज खिलवाड़ होते हैं,
ऐसी सुर्ख़ियों से समाचार पत्र रोज भरे होते हैं,
कोई और नहीं जिम्मेवार इस देश का हर एक रहने वाला है।
कुछ दिनों से चारों तरफ तिरंगे की ही रौनक है,
ऐसा लग रहा है जैसे 15 अगस्त आने वाला है।

किसानों को फसलों का मूल्य नहीं मिलता मजदूर को उसका वेतन,
फिर भी उनके लाडले सीमा पर बचा रहे हमारा वतन,
इन बहादुर सैनिकों को झुककर सलाम करने का दिन आने वाला है।
कुछ दिनों से चारों तरफ तिरंगे की ही रौनक है,
ऐसा लग रहा है जैसे 15 अगस्त आने वाला है।

विदेशों के लोग विकसित होकर अविष्कारों के आयाम छू रहे,
हम लोग आंतरिक जाति धर्म और अलगाववाद से जूझ रहे,
सभी को तिरंगे के नीचे बैठ कर वैर भाव भुला देने का दिन आने वाला है।
कुछ दिनों से चारों तरफ तिरंगे की ही रौनक है,
ऐसा लग रहा है जैसे 15 अगस्त आने वाला है।

इन समस्याओं से आहत होकर मेरे देश में अभी भी जान बाकी है,
सबसे ऊपर आने के लिए हमें चंद लम्हे ही काफी है,
अब देश का नागरिक हर रोज स्वतंत्रता दिवस मनाने वाला है,
विश्वास "Raj" कि हमारा स्वर्णिम युग आने वाला है,
जल्दी हमारा देश फिर से सोने की चिड़िया बनने वाला है,
फिर 1 दिन नहीं हर दिन चारों तरफ तिरंगे की ही रौनक होगी ऐसा लगेगा जैसे 15 अगस्त हर रोज आने वाला है।।

Written By Hom Krishan *Raj*


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Wednesday, January 2, 2019

मैं तो लिख देता हूँ- A Poem who share Poet's feeling

3:39 AM 0

जब मन थोड़ा चकराता है, जब मन थोड़ा झुंझलाता है,
मैं तो लिख देता हूँ, जो भी मन में आता है मैं बस लिख देता हूँ।

लोग रोते होंगे किसी के बिन उसके ख्यालों में,
मैं तो ख्यालों के मोती पिरोकर माला पहन लेता हूँ ,
भीगता हूँ जब भी गमो की बारिश में
रूप शब्द का देकर मैं तो लिख देता हूँ।
. . . . . . . . . मैं तो लिख देता हूँ।

हुआ था रंगीन कुछ मुद्दतों बाद ,
पूरे न हो सके कुछ अनसुलझे ख्वाब,
ख्यालों के जाल से बचने के लिए कभी कभी रो देता हूँ।
बाकी यादों की बहार को और उस एकतरफा प्यार को
मैं तो लिख देता हूँ।
जो भी मन में आता है मैं तो लिख देता हूँ।

Motivational


चलते चलते जो रुक जाए वो चाल काबिल नहीं होती,
पथ पर चाल जैसी भी हो कलम
को चाहकर दौड़ा देता हूँ,
अटकलें मंजिलों का सबूत है परवाह नहीं,
समाधान मिसरों में बदलकर मैं तो लिख देता हूँ।
जो भी मन में आता है मैं तो लिख देता हूँ।

कौन है जो हारा न हो,
दुनिया में ग़मों का मारा न हो,
हार से जीत का लेकर सबब कमर कस देता हूँ ,
जीत से चुकती हार को या बढ़ती ग़मों की मार को
मैं बस लिख देता हूँ , जो भी मन। . . . . .

सब लिख लिया जो दिल में दफन था,
अब जल गया जो भ्रम का कफ़न था ,
इसके सभी विकारों को और भ्रमीत विचारों को,
झट से भगा देता हूँ।
जब मन थोड़ा चकराता है, जब मन थोड़ा झुंझलाता है,
बस इतना सा लिख देता हूँ।

दिखाई न मंजिल अगर , क्या सपने छोड़े जाते है ,
भटके हुए मुसाफिर क्या आधे से लौट आते है ,
जुगनुओं का काम है चमकना ,
अँधेरे में भी अपना काम किये देता हूँ ,
कलम, लफ्ज, अल्फाज को "Raj " बाकी बचे हिसाब को मैं तो लिख देता हूँ।
जो भी मन में आता है मैं तो लिख देता हूँ.

Written by Hom Krishan"Raj"

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Wednesday, December 26, 2018

तुम्हारी आंखे - जिन पर में मरता था

5:24 AM 0

दास्तान उन नैनों की जो कर गई बेहोश मुझे ,
होश में होकर भी होश न आये ऐसी मदहोश तुम्हारी आँखे।

नजरें मिली जब तुमसे न जाने कुछ होने लगा,
बस देखते देखते ही प्यार आये मासूम प्यारी तुम्हारी आँखे।


झांक कर अंदर सूक्ष्म तहों में रंगीन जमाना दिखने लगा ,
शराब से भी वो नशा न आये ऐसी नशीली तुम्हारी आँखे।

शर्म हया से झुके जो सात खून भी माफ़ करवा दे ,
छिपी साथ में शरारतें लाखों ऐसी चंचल तुम्हारी आँखे।

तेज आंखों में ऐसा कि कुछ भी कर गुजरे ,
कभी बर्फ से ठंडी नज़र आये ऐसी शीतल तुम्हारी आँखे।

एक बार देखा था "cutie" अब देखता ही रहुंगा ,
देख कर "Raj" सुकून मिले ऐसी अद्भुत तुम्हारी आँखे।

Written by Hom Krishan"Raj"
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